Tuesday, April 20, 2010

बेफिक्र है मेरा आचल् क्यो ???

नही कर पा रही हूँ अपने आप से वफाई.... किस चीज की कमी है जो बढने नही दे रही है मुझे ओर मेरी सोच को ? करना चाहती हूँ जो हांसिल उसी से दूर होती जा रही हूँ समय के पहिये के साथ घूम रही हूँ खुश हो रही हूँ हंस रही सबको प्यार दे रही हूँ पा रहि हु लेकिन अपने से ही बेगानी बन गयी हूँ। कभी- कभी लगता है कि किसी अँधेरे कमरे में बैठ कर पा लूँ वो जो गुम हो गया है मुझसे ! किसी अनजाने शहर में जाकर खुद को गुमा दूँ ओर फिर उस अनजाने पल का आनन्द जी भर के समेट लु अपने आचल् मे । ओर भी है बहुत लेकिन सब् है मुझ् से जुदा-जुदा । क्या आलम है ये ??? क्या मै इस से बाहर आ पायुगी ???

10 comments:

संजय भास्‍कर said...

वाह! अति सुन्दर!

सुनील पाण्‍डेय said...

बहुत अच्‍छी रचना, प्रयास सराहनीय।

सुनील पाण्‍डेय
नई दिल्‍ली।

Anonymous said...

सार्थक प्रयास - शुभकामनाएं

Anonymous said...

क्या बातें कर रहे थे ये तो मुझे भी नहीं पता - सोचा बिना कुछ कहे ही निकल जाऊं लेकिन नहीं.

सहज समाधि आश्रम said...

वास्तव में सविता जी ये स्त्री या पुरुष का
मैटर नहीं है (आपकी रचनायें और आत्मकथ्य
आदि पङने के बाद ) दरअसल जीव अपने
वास्तविक घर न पहुँचने से अशान्त हैं आप
को ये अजीव लगेगा पर प्रत्येक जीव जव
गर्भ में होता है तो उसे परमात्म सत्ता का
बोध होता है और वह गर्भ में प्रतिग्या भी
करता है कि अबकी बार मैं पूरा जीवन तेरा
नाम जो कि परमात्मा का असली नाम और
मुक्ति का हेतुक है उसको ही जपूँगा परन्तु
गर्भ से बाहर आकर उसको माया प्रभावित
कर देती है और वह सब भूल जाता है ..तो
आपका ये अहसास अन्जाना इत्यादि..जो
भी भावनांए है वो अपने उसी घर से बिछङ्ने
की ही हैं और ये सिर्फ़ आपकी नहीं सब की है
जो इस मनुष्य देह में है कहना उचित नहीं
लगता पर आप मेरे ब्लाग पर पङें आपको
बहुत से प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगे
शेष शुभकामनाएं

Unknown said...

hummmm sabse pahle to sudar abhiwyakti ke liye badhae....ab baat aapke prashno ki...to DOST khud ko pahchano! koi gum nhi hua hai sab aapke paas aapke bhitar hai!!or ek baar gum hokar dekhojindgi bahut haseen hai!!


Jai Ho Mangalmay HO

Savita Rana said...

Rajeev ji, Vivek ji or E-guru rajeev ji aap sabhi ka main tehe dil se dhanaywad deti hun, bahut-bahut shukriya mere blog per aane ke liye aap sabhi ka......

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

thodi si bas anubhuti-bhar hai yah... jiske liye bahut badaayi vali baat to nahin kee jaa sakti...haan prayaas acchha hai....galtiyaan bhi kuchh sudhaarni hongi...

सुशील छौक्कर said...

इतना काहे सोचती है। जो पल मिले उसे बस जी जाओ। सवालों में उलझोगी तो उलझती चली जाओगी। और हाँ लिखती रहे लिखने से सुकून मिलता है।

पूनम श्रीवास्तव said...

Bahut achchha likha hai savita---achchhii koshish hai...ummeed hai age likhogee bhee aur dppsaron ka likha padhogee bhee.shubhakamnayen.