Thursday, April 15, 2010

खोया सा है मेरा आंचल

बारीश के आलम कि चाहत तो हमने न कि थी
बस थोडी सी ही बाकी थी आरजू हमारी जहां

जाने कि तलब जगती रहेगी इस दुनिया से हमारी
बस दिल भर गया है अब तो जाने भी दो युही

कोई रस्ता नही मिलता है जब मुसाफिर को
ओर मंजिल भी लगने लगती हो परायी सी

डूबना ही है उस समुंदर मे जहा न हो रिश्तो कि डोरी
खो कर उस निळे आंचल मे काश ! की सुकून मिल जाये !!११!!

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