Thursday, November 26, 2009

फ़र्ज़

हर एक खुशी फ़र्ज़ निभा कर चली गई
मेरा पता गमो को बता कर चली गयी !

यूँ तो हर एक मौसम बिजली गिरा गया
बरसात आके घर को जला कर चली गयी
मेरा पता ग़मों को बता कर चली गयी !

क्या खूब जानती थी फिजा घर के रास्ते
फासले बहार आंख चुरा कर चली गयी
मेरा पता ग़मों को बता कर चली गयी !

मेरे नसीब में थे कहां महकते चमन
फूलो की सूरत भी कांटे चुभन कर चली गयी
मेरा पता गमो को बता कर चली गयी !

दिखा कर खुशी को रास्ते मेरे घर के
रास्तो में गहरा अँधियारा फेला कर चली गयी
मेरा पता गमो को बता कर चली गयी !

यूँ तो हमने भी देखी थी चमक सितारों की
बनके चमक भी अंगारे बरसा के चली गयी
मेरा पता गमो को बता कर चली गयी !

दिखा हर एक सूरत में प्यार छलकता जहां
बनके मेहमां घर को बसा कर चली गयी
मेरे पता गमो को बता कर चली गयी !

Friday, November 20, 2009

Ehsaas तेरे आने का

लोग कहते हैं ज़मीं पर किसी को खुदा नहीं मीलता
शायद उन लोगों को हमसफ़र कोई तुम-सा नहीं मिलता

किस्मतवालों को ही मिलती है पनाह किसी के दिल में
यूं हर शख़्स को तो जन्नत का पता नहीं मिलता

अपने सायें से भी ज़यादा यकीं है मुझे तुम पर
अंधेरों में तुम तो मिल जाते हो, साया नहीं मिलता

इस बेवफ़ा ज़िंदगी से शायद मुझे इतनी मोहब्बत ना होती
अगर इस ज़िंदगी में दोस्त कोई तुम जैसा नहीं मिलता

अपनों के साये से भी बढ़ कर मैंने तुझे पाया है
कभी मत कहना की हम से किसी को प्यार नही मिलता

आपको होगी हमसे कोई शिकायत तो हक़ से मिटा देना
प्यार में फना होने वाला आपको कोई हमसा नही मिलता

Wednesday, November 18, 2009

वक्त की कीमत

हर ख़ुशी है लोगो के दामन में
पर एक हंसी के लिए वक्त नही
दिन रात दौड़ती दुनिया में
जिंदगी के लिए ही वक्त नही !!!!

माँ की लोरी का एहसास तो है
पर माँ को माँ कहने का वक्त नही
सारे रिश्तो को तो हम मार चुके
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक्त नही !!!!

सारे नाम मोबाइल मैं है
पर दोस्ती के लिल्ये वक्त नही
गैरों की क्या बात करें
जब अपनों के लिए ही वक्त नही !!!!

आँखों में है नीद बड़ी
पर सोने का वक्त नही
दिल है गमो से भरा हुआ
पर रोने का भी वक्त नही !!!!

पैसों की दौड़ में ऐसे दौड़े
की थकने का भी वक्त नही
पराये एहसासों की क्या कद्र करें
जब अपने सपनो के लिए ही वक्त नही !!!!

तू ही बता ये जिंदगी
इस जिंदगी का क्या होगा
की हर पल मरने वालों को
जीने के लिए भी वक्त नही !!!!

अनजाने रिश्ते

 कभी-कभी हम अनजाने में किसी के लिए कितना कुछ कर जाते है सोच भी नही सकते की ये हमने ही किया है ! और वो भी किसी ऐसे अनजान इन्सान की लिए जिसके साथ में हमारा दूर-दूर तक कोई रिश्ता नही होता फिर भी हम अपनों से भी बढ़ कर करते है, आज की भाग दोड भरी जिन्दगी में हम ऐसे किनते ही लोगो से मिलते है बात करते उनके दुःख सुख बाटते है साथ हँसते है रोते है! लेकिन उनमे से कितने हमारे साथ आगे चल पाते है ?.........

मैं ये तो नही कहूंगी की कभी किसी अनजान रिश्ते से नही जुड़ना चाहिए ! चाहे वो दोस्त के रूप में हो भाई के हो या बहन के रूप में मिले ! लेकिन ये सवाल आज मेरे सामने एक बहुत बड़ा पहाड़ बनकर खड़ा है जो हमेशा मुझे ऐसे ही एक रिश्ते की याद दिलाता रहता है जिसे मैंने दोस्त के रूप में पाया ! बीते दिनों के बारे में सोचती हूँ तो अपने आप से नफरत होने लगती है की मैंने ऐसे इंसान से दोस्ती क्यों की जिसे दोस्ती का अर्थ तक मालूम नही था ! अपनी जिन्दगी का बेशकीमती टाइम मैंने उसे दिया ! हर प्रकार से उसकी मदद करती थी ! इतना तो मैंने कभी अपने कैरिएर पर धयान नही लगाया जितना मैं उसके लिए इधर से उधर भागती थी ! बस उस वक्त यही लगता था की एक अच्छे इन्सान की मदद करना मेरा फर्ज है जो मुझे करनी चाहिए और कुछ नही चाहती थी मैं बस यही सोचती थी की अगर मैं अपने दोस्त के लिए कुछ कर सकती हूँ तो मुझे करना चाहिए कुछ भी सोचे समझे! शाएद ही कभी इतना मैंने कभी अपने परिवार वालो की लिए सोचा हो ! आज यही बात मुझे दुःख देती है की मैंने अपनों से बढकर जिसकी मदद की उसने मेरे विश्वास को रोंद दिया ! पैसो की भी कभी कमी नही आने दी जब देती थी तो लगता था की आज मेरे पास है तो मुझे उस की मदद करनी चाहिए शाएद भगवन की यही मर्जी है जो मुझे दोस्त बनाकर वो अपने भक्तो की मदद करना चाहता है ! हर एक कदम मैं भगवन को याद करके ही आगे बढाती थी फिर आज मुझे क्यों पछतावा हो रहा है अपनी करनी पर ! क्यों नही भुला पा रही मैं वो सब जो मैंने उस इन्सान के लिए किया...?

आज मुझे लगता है की अगर मैंने इतना कुछ उस दोस्त रूपी इन्सान के लिए किया तो इसमें में भी उपर वाले की ही कोई मर्जी रही होगी ! शायद पिछले जन्म का कोई कर्ज चुकाना था मुझे जो मैंने चुका दिया ! अब बाद में क्या पछतावा करना की मेरा अपना बनकर किसी ने मुझ से क्या लिया और क्या दिया.........

Tuesday, November 03, 2009

वो भीगे हुए चाँद की रोशानी

आज चमकते हुए चाँद को देखने की आस है
तेरे संग में तारो के साथ मिल कर खेलने की प्यास है !!

जमी पर चाँद ने आज बिखेरा है अपना शर्मीला हुस्न
क्या? आज तेरे आने की भी कोई आस है मेरे आगन में !!

तारो ने मनाई है आज ख़ुशी चलो कही तो प्यास है
मेरी न सही किसी की तो आज बुझी बरसो की प्यास है !!

सुनहरे रेती पर चमकते हुए चाँद की वो प्यारी रौशनी
आज भी याद है मुझे बचपन की हंसी जब देखी वो चांदनी !!

भूले से भी नही भुला सकती वो चमकते हुए रेत की खुशी
मैं भी खुश होती थी उसके साथ में दिल में न थी कोई आस भी !!

जाते हुए लम्हों को करना चाहती हूँ शामिल अपनी यादो में
बर्षो के बाद जगी है आज तमन्ना क्या फिर से भी जा पाऊँगी !!

जो जिए थे मैंने अनजाने से एहसास खुबसूरत चाँद के साथ में
क्या फिर से जा पाऊँगी मैं उस चमकते हुए देश में ??????????