Tuesday, April 20, 2010

बेफिक्र है मेरा आचल् क्यो ???

नही कर पा रही हूँ अपने आप से वफाई.... किस चीज की कमी है जो बढने नही दे रही है मुझे ओर मेरी सोच को ? करना चाहती हूँ जो हांसिल उसी से दूर होती जा रही हूँ समय के पहिये के साथ घूम रही हूँ खुश हो रही हूँ हंस रही सबको प्यार दे रही हूँ पा रहि हु लेकिन अपने से ही बेगानी बन गयी हूँ। कभी- कभी लगता है कि किसी अँधेरे कमरे में बैठ कर पा लूँ वो जो गुम हो गया है मुझसे ! किसी अनजाने शहर में जाकर खुद को गुमा दूँ ओर फिर उस अनजाने पल का आनन्द जी भर के समेट लु अपने आचल् मे । ओर भी है बहुत लेकिन सब् है मुझ् से जुदा-जुदा । क्या आलम है ये ??? क्या मै इस से बाहर आ पायुगी ???

Monday, April 19, 2010

बीत गया जो पल

रूठ कर भी हम ज़माने में रह ना पाएंगे
जब भी याद करोगे हमे पास पायोगे !!!!!

दिल के आएने में तेरी तस्वीर बसा रखी है
क्या हम उस से भी कभी नजरे छुपा पाएंगे ?!!!!!!

पता नही है हमको कब तलक साथ है
हमारी ये किस्मत भी बड़ी बेरहम है !!!!!!

तेरे आने की आहेट को जानकर भी अनजान है
लेकिन मेरे जीवन की हर एक सांस तेरे नाम है !!!!!!!

Thursday, April 15, 2010

खोया सा है मेरा आंचल

बारीश के आलम कि चाहत तो हमने न कि थी
बस थोडी सी ही बाकी थी आरजू हमारी जहां

जाने कि तलब जगती रहेगी इस दुनिया से हमारी
बस दिल भर गया है अब तो जाने भी दो युही

कोई रस्ता नही मिलता है जब मुसाफिर को
ओर मंजिल भी लगने लगती हो परायी सी

डूबना ही है उस समुंदर मे जहा न हो रिश्तो कि डोरी
खो कर उस निळे आंचल मे काश ! की सुकून मिल जाये !!११!!