Friday, September 24, 2010

आलम है ये जो गुजरता ही नही


बहुत टाइम के बाद आज ब्लॉग पर आना हुआ अपना लिखा हुआ ही पढ़ रही थी सोचा इसको पढकर ही कुछ लिखने का मन कर जाये लेकिन शब्द साथ नही दे रहे मन में बहुत विचार उमड़ रहे है जिन्हें कोरे कागज़ पर उतार कर ठहरे हुए पानी की तरह शांत हो जाना चाहती हूँ, बहुत कुछ है कहने को लेकिन.............................................

Thursday, June 03, 2010

सुखी जीवन के सूत्र

१। जीवन में सिर्फ इच्छाएं नही पालिए लक्ष्य बनाईये
२। सोचिये जो भी मेरे पास है खास है
३। हमारी तीन महत्त्वपूर्ण संपतिया है- शारीर, समय व् मनोवर्ती
४। सफलता के तीन नियम है- मेहनत आत्मविश्वास एव आत्मविश्वास
५ कोई भी काम सिर्फ काम चालाने के लिए नही,
परन्तु आगे बढ़ने के लिए करे
६। यदि पूरी जिन्दगी के लिए खुशी चाहते है
तो अपने काम से प्यार करना सीखे
७। असफलता वह अवसर है जब आप आधिक
समजदारी से दोबारा शुरुआत कर सकते है
८। खुश रहना अक आदत है लगन से मेहनत
करना भी एक आदत है
९। कोलूह का बैल सारा दिन घूमता रहता है
लेकिन रहता है वही का वही ही
१०। पढ़े-लिखे होने से अच्छा है पढ़ते लिखते रहना
११। दलदल में रहोगे तो तैरना नही सीखोगे
१२। खाविश को पूरा करने की कोशिश करे
ताकि भविष्य में खेद नही रहे की कोशिश नही की थी
१३ सीधी बातचीत मित्रता बनाये रखने का अच्छा तरीका है
१४। हर दिन की शुरुआत शुखाद, संतुट व् सुखी
नजरिये से कीजिये आप पाएंगे की आप का
दिन सुखद व् सफल गुजरेगा

Tuesday, May 04, 2010

एक मुसाफिर के सफर सी है सबकी दुनिया

अब खुशी हैं न कोई दर्द रुलाने वाला,
हमने अपना लिया हर रंग जमाने वाला !

हर बेचेहरा सी उम्मीद है चेहरा -चेहरा
जिस तरफ देखिये आने को है आने वाला !

उसको रुखसत तो किया मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला !


घर के चाँद को देखो किसी आँचल में
ये उजाला नही आँगन में समाने वाला !

एक मुसाफिर के सफर सी है सबकी दुनिया
कोई जल्दी में तो कोई देर से जाने वाला !

Monday, May 03, 2010

यादे जो कभी जाती नही

तेरे कदमो की आहेट सुन के हम जाग जाते थे
उस सुनेहेरे उजाले मे हम अपने को भी भूल जाते थे

कल रात हम फिर से करते रहे तेरा इंतजार
ना तू आया ना तेरी वो सुनेहरी चांदनी आई

बस करवते ही बदलते रहे हम पुरी रात भर
ना तू आया ना वो तेरी मनचली याद आई

सोचा की जाकर खोज लायू कही से तुम्हे
ओर रख लु सिऱ्हाने पर कही छुपा कर

मिल जाये वो सुकून मुझे जो तुम आ जायो
यही सोच कर बस युह्नी करवते बदलती रही

रात भर युंही उसकी याद मे जगती रही
तुम सोते रहे ओर में यादे सजोती रही

Tuesday, April 20, 2010

बेफिक्र है मेरा आचल् क्यो ???

नही कर पा रही हूँ अपने आप से वफाई.... किस चीज की कमी है जो बढने नही दे रही है मुझे ओर मेरी सोच को ? करना चाहती हूँ जो हांसिल उसी से दूर होती जा रही हूँ समय के पहिये के साथ घूम रही हूँ खुश हो रही हूँ हंस रही सबको प्यार दे रही हूँ पा रहि हु लेकिन अपने से ही बेगानी बन गयी हूँ। कभी- कभी लगता है कि किसी अँधेरे कमरे में बैठ कर पा लूँ वो जो गुम हो गया है मुझसे ! किसी अनजाने शहर में जाकर खुद को गुमा दूँ ओर फिर उस अनजाने पल का आनन्द जी भर के समेट लु अपने आचल् मे । ओर भी है बहुत लेकिन सब् है मुझ् से जुदा-जुदा । क्या आलम है ये ??? क्या मै इस से बाहर आ पायुगी ???

Monday, April 19, 2010

बीत गया जो पल

रूठ कर भी हम ज़माने में रह ना पाएंगे
जब भी याद करोगे हमे पास पायोगे !!!!!

दिल के आएने में तेरी तस्वीर बसा रखी है
क्या हम उस से भी कभी नजरे छुपा पाएंगे ?!!!!!!

पता नही है हमको कब तलक साथ है
हमारी ये किस्मत भी बड़ी बेरहम है !!!!!!

तेरे आने की आहेट को जानकर भी अनजान है
लेकिन मेरे जीवन की हर एक सांस तेरे नाम है !!!!!!!

Thursday, April 15, 2010

खोया सा है मेरा आंचल

बारीश के आलम कि चाहत तो हमने न कि थी
बस थोडी सी ही बाकी थी आरजू हमारी जहां

जाने कि तलब जगती रहेगी इस दुनिया से हमारी
बस दिल भर गया है अब तो जाने भी दो युही

कोई रस्ता नही मिलता है जब मुसाफिर को
ओर मंजिल भी लगने लगती हो परायी सी

डूबना ही है उस समुंदर मे जहा न हो रिश्तो कि डोरी
खो कर उस निळे आंचल मे काश ! की सुकून मिल जाये !!११!!

Thursday, February 25, 2010

वारिस

पुरानी डायरी के पन्नो पर लिखे हुए मेरे ये शब्द आज भी मुझे वही एश्सास दिलाते है जब मैंने पहली बार माँ से उसके बारे में सुना था ! उस दिन माँ कुछ काम करने में व्यस्त थी और मैं माँ के पास ही बैठी हुई kitaab के पेज उलट-पलट रही थी ! मेरा पढने में मन नही लग रहा था मैं बार-बार मेरे नानाजी बहुत ही अच्छे इंसान थे ! बस मैंने माँ को उनके बचपन के बारे में पूछना शुरू किया जिस में नानाजी की बहुत सी यादे जुडी हुई थी ! ये घटना मुझे आज भी वैसे ही याद है, जैसे मैंने पहली बार इसे माँ से सुना था, रिश्तो के बंधन की दांस्ता जो हमे एक नारी के बलिदान, त्याग और सहनशीलता का उदहारण देती है

' मैंने जो किया है क्या वो सब लोगो के सामने बस एक दिखावा भर रह जायेगा ' नही बेटी ! " अम्मा कही दूर देखती हुई बोले जा रही थी " अभी तो मुझे अपना कर्तव्य और निभाना है ! "अम्मा बोले जा रही थी मुझे उनकी आँखों में मुझे वो चमक नज़र आ रही थी जो एक २०-२२ साल की लड़की आँखों में होती है ! जब वह अपने ससुराल जाती है" मैंने उनका हाथ पकड़ते हुए बोला ! अम्मा ! अब बस भी करो अंदर जाकर आराम करो ! आप की तबियत भी ठीक नही है , कोई नही आएगा तुम्हे लेने के लिए " मैंने उठते हुए बोला इन बीस सालो में किसी ने भी आप की तरफ मुडकर भी नही देखा है और आप............... " अम्मा बीच में ही मेरी बात को अनसुना करते हुए बोलती है ! नही बेटी !!!!!!! " अम्मा मुस्कुराते हुए मुझे देखते हुए कहती है " मुझे इसकी कोई परवाह नही है वो इतने सालो से नही आये तो क्या मैं अपना फ़र्ज़ भूल जायुं ! " अम्मा उदास होते हुए बोलती है " मैं अपनी अंतिम सांसे भी उन्ही के नाम कर देना चाहती हूँ आज उनको मेरी जरुरत है !!!


" अम्मा बोले जा रही थी "


बेटी तुम क्या जानो रिश्तो की गहरायिओं को मैंने रिश्तो को बहुत करीब से बनते और बिगड़ते देखा है ! संजीव ( amma ka pati ) अब मौत के मुह के कगार पर खड़ा हुआ था ! उसने सरस्वती के पास सन्देश भेजा की वह उसको लेने के लिए अपने बेटो को भेज रहा है ! संजीव की दूसरी पत्नी तारा जिसके तीन बेटे हुए थे और उसके बाद वह उसका साथ छोडकर स्वर्ग सिधार गयी ! जिसकी खातिर संजीव ने सरस्वती को घर से निकाला था आज अंतिम झानो में वो भी उसका साथ न दे पाई !!!!!!!


हम चार बहने थी मैं घर में सबसे बड़ी थी दूसरी बहन अनीता और उस से छोटी मंजू और सबसे छोटी प्रीती जब दस साल की थी तो माँ गुजर गयी ! बाबूजी के उपर सारी जिमेवारी आ गयी थी ! बाबूजी सुबहा होते ही खेत पर काम करने चले जाते ! और मैं तीनो बहनों को तेयार कर स्कूल भेज देती ! मैं सारा दिन घर पर रहकर चुल्हा चोका करती थी ! मैं जादा नही पढ़ पाई माँ के जाने के बाद पूरा काम मैंने सभाल लिया था बस पढना जानती थी लिखना ठीक से नही आता था ! उस टाइम में लडकियों को पढ़ाना एक पाप की तरह मना जाता था माँ के टाइम में बाबूजी ने कभी मुझे घर से बहार नही निकलने देते थे ! मैं बाबूजी की सबसे जादा लाडली थी लेकिन फिर भी मैंने थोडा पढना-लिखना सिख लिया था !!!! जब अनीता घर का चूल्हा चोका करने लगी तो बाबूजी ने मुझे मामाजी के पास भेज दिया और उनसे कहा की " अब बेटियां जवान हो गयी है इनकी शादी की जिमेवारी आप पर ही है मैं तो गंवार आदमी हूँ ! मैं क्या जानू शादी-बय्ह रचाना, मैं तो बस खेतो में कमा कर दे सकती हूँ


मेरे मामाजी भी हम चारो बहनों को बहुत प्यार करते थे ! धीरे-धीरे मामाजी ने हम चारो को अपने पास बुला लिया ! उनको कोई संतान न थी उनकी दो बीवियां थी दूसरी बीवी उनके भाई की विधवा थी जिसको उन्हें अपने साथ ही रखना पड़ा ये सब उनकी पत्नी को अच्छा नही लगा और व्ह अपने मायेके में जाकर रहने लगी! दूसरी पत्नी को कोई बच्चा नही था तो मामाजी हम चारो बहनों को अपने साथ रखने लगे !


हम लोग वहां बहुत खुश थे मामाजी हमे खेत पर अपने साथ लेकर जाते और साथ ही लेट थे !


जब मैं सोलह साल की थी तो मामाजी ने मेरी शादी कर दी ! और उसके एक-एक साल बाद मेरी तीनो बहनों के हाथ पीले कर दिए ! हम चारो बहनों की शादी अच्छे परिवारों में हुई थी !


मैं अपने ससुराल में इकलोती बहु थी ! सास शादी से पहले ही गुजर चुकी थी ! घर में नोकर- चाकर बहुत थे लेकिन फिर भी मैं सारा दिन घर के कामो में लगी रहती थी !!


शादी को एक साल भी नही गुजरा था की मेरे पेरो तलो की जमीन खिसक गयी!


एक दिन शाम को मैं रोज की तरह भेसो को चारा डालकर घर को आई थी ! मैं अंदर जाकर अपने कमरे में लेती ही थी की ! अचानक से बहार की और से मुझे तेज-तेज आवाजे सुनई पड़ी मैं जल्दी से उठकर बहार की तरफ आई ! तो देखा की ससुर जी अपने हाथो में उनके खून से भीगे हुए कपडे लिए हुए दरवाजे पर थे ! मैं पर्दे के पीछे से ये सब देख रही थी वः अंदर आकर जमीन पर बैठ गये ! वः ऐसे दिख रहे थे की जैसे उनकी सांसो ने ही उनका साथ छोड़ दिया हो ! उनके पीछे गावं के कुछ और भी आदमी थे जो उनको घेरे हुए थे ! सभी आपस में खुसुर - मुसुर कर रहे थे किसी आवाज़ साफ सुनाई नही पढ़ रही थी ! तभी मैंने थोडा आगे बढकर देखा तो ससुर जी अपने दोनों हाथ उपर उठाये चीख-चीख कर जैसे सारे आसमान को अपने पास बुलाना चाहते हो ! वः रोते-रोते नीचे जमीन पर गिर गये वः फुट-फुट कर रो रहे थे ! सभी की आँखों में आंसू थे मुझे अब सबकुछ समंझ आ गया था मेरी होठो की हंसी पानी की तरह बह चुकी थी ! मैं जहाँ खाड़ी थी वही निचे की और बैठ गयी ! समंझ में नही आ रहा था की ये सब क्या हो रहा है ! अभी थोड़ी देर पहले तक मैं बहुत खुश थी और अभी जैसे मेरे शारीर से आत्मा को निकाल लिया गया हो ! पड़ोस की ओरते मुझे घेरे हुए बैठी थी ! मेरी आँखों से आंसू बहे जा रहे थे ! मैं एक लगाये हुए अपने कमरे की तरफ देखे जा रही थी ! तभी किसी ने आकर मेरे हाथो की चुदियाँ मोलाई जा रही थी मैं बेसुध की तरह ' जिसमे अब कुछ भी नही बचा हो ' ऐसे ही बैठी रही ! और फिर कमला ने पकड़ कर mujh झकझोरा " सरस्वती हम आनाथ हो गये है मेरा भाई तुम्हे छोडकर जा चुका है तुम बिधवा हो चुकी हो "


मैंने कमला की तरफ देखा और उसके गले से लगकर चीख-चीखकर रोने लगी ! कमला भी बुरी तरह से रोये जा रही थी उसका एकलोता भाई जो जा चुका था ! सब कुछ ख़त्म हो चुका था !


समय कुछ बीता कमला भी अपने ससुराल चली गयी वो ही तो इकलोती बची थी इस परिवार की !




(आगे पढने के लिए अभी थोडा इंतजार करना होगा)

जाने क्यों तुम इतना याद आते हो !


देखती हुँ मैं जब-जब तेरी सुरत दिल को मेरे करार आता है
तु दुर ही सही मुझ से ! मेरे इस दिल के करीब तो रहता है

न तुझ से कह पाए ना खुद ही जान पाए अपने दिल की हालत
मेरे इस कम्बख्त दिल को भी अभी तेरा दुर जाना याद आया

दूर रह के भी हक़ जताते हो मुझ पर तुमने क्या रोब जमाया है
कभी तो सुनाया करो अपनी आवाज भी जिस से हमे करार आता है

सुबह जगते ही तेरा ख्याल आता है जाने क्यों तुम इतना याद आते हो
आँखे मलते जाते है अपने आगंन में फिर भी तुम नजरो से दूर होते हो

यादे बड़ी जालिम होती है डूबा देती है हमे तेरे आतीत के आईने में
समझाते है फिर अकेले में बैठ कर दिल को जब भी बहुत याद आता है

Wednesday, February 17, 2010

बहुत याद आती हो तुम !!!!!!










कैसी हो.... कहाँ हो.. ? बहुत याद आती हो तुम !!!!!!!

जब से गई हो तुम मुझसे दूर, जीवन में मेरे तन्हियो का डेरा हो गया है
रह गयी है बस चंद यादे तेरी, मेरी रातो में तेरी यादो का बसेरा हो गया है

सोचती हूँ मैं जब भी अकेले में की , ऐसी क्या खता हो गयी है मुझसे
इतनी दूर जाने के बाद हमसे , अकेले में ही सिमट गयी हो तुम सबसे

आज भी याद आता है मुझे वो, मेरे रूठने पर तेरा प्यार से मना ना
और साथ में बैठ कर मुझे चिढाना, अपनी यादो में चुप से तेरा खो जाना

बहुत याद आती हो जब भी तुम, आंसुओ के साथ ठहर जाती है मेरी सांसे
तेरी हर एक शिकायत को माना है , हर पल दिल में बसा कर रखा है मैंने

जो भी तेरी जबां पर आया, उसी को आईने में सजाया है मैंने
दर्द बन गयी है अब तो ये जुदाई, नही सही जाती मुझसे तेरी ये बेरुखी

आकर देख तो तू! मेरी दुनिया, गमो ने छोड़ी है अपनी परछाई
दर्द भरा आइना दिखाया नही जाता, अपना बुलाकर यूँ पराया बनाया नही जाता

जीवन की बिच राह में छोडकर, अपनों से किनारा बनाया नही जाता
जहाँ कही भी रहो तुम, हमेशा दिल में महक बनकर बसी रहोगी मेरे !!!!!!

Wednesday, February 10, 2010

वो ना जाने क्यों राहे बनाते गये ...?

देख कर मेरे घर की रौनक
वहां भी तूफान आ गया
करते रहे वो हम से मीठी बाते
फिर क्यों दिलो में जहर घोल गये !!

दुआ करते रहे घर को जलाने की
क्यों वो खुद को ही जलाते गये
करते रहे वो हम से मीठी बाते
फिर क्यों दिलो में जहर घोल गये !!

नही की थी हमने चाहत उनकी
वो ना जाने क्यों राहे बनाते गये
करते रहे वो हम से मीठी बाते
फिर क्यों दिलो में जहर घोल गये !!

जब भी देखी हमने सूरत उनकी
वफा के नाम पर वो नकाब दे गये
करते रहे वो हम से मीठी बाते
फिर क्यों दिलो में जहर घोल गये !!

लगता था उसको सबकुछ अपना
पराया बनके अंजाम दिखा गये
करते रहे वो हम से मीठी बाते
फिर क्यों दिलो में जहर घोल गये !!

Thursday, January 21, 2010

फिर भी क्यों लगता है ऐसे की कुछ था मेरे सामने

उस गहरी काली रात की घटा अभी तलक तक उतरी नही
सोचती रही मैं जब तलक ये सांस मेरी चलती रही

देखना चाहती थी मैं बादलो के उस पार का वो राज
जिसके लिए मेरी ये आँखे बरसो से तरसती रही

छा गया गहन अँधियारा मेरे अपने उस जहाँन में
फिर भी क्यों लगता है ऐसे की कुछ था मेरे सामने

किनारा नही मिलता है किसी को उस सागर की ग्हेरायी में
सोच कर रह जाती हूँ मैं बस अपनी ही तान्हाहियो में

कहने के लिए कुछ शब्द ही नही थे मेरे महेकाने में
पगली बनी देखती रही मैं और कहीं दूर डूबता रहा मेरा आशियाना !!!!!!!!!!!!!

Tuesday, January 05, 2010

नया साल आया है

 " गीता सच में बतायो ना नये साल की  शुरुआत हो गयी है क्या ?. लेकिन नया जैसा तो कुछ भी नही दिख रहा है मुझे ! वही सब पुराना ही तो है ! "    बचपन में यही सवाल पुछ-पुछ कर मैं घर में सबको परेशान करती रहती थी ! और सबका जबाब यही होता था      " तू मुझे परेशान मत कर ! जा किसी और का दिमांग चाट मुझे बहुत काम करना है"     समंझ नही आता था की ये नये साल आने से होता क्या है सब कोई नया साल आ गया- नया साल आ गया करते रहते थे, लेकिन मुझे तो नये साल में कुछ नया नही लगता था ! बस यही सोच कर मैं रह जाती थी की जब महीने बदलते है तो उसे ही नया साल आ गया कहते है पहले परिवारों में बच्चो के सवालो के जबाब परिवार वालो के लिए सर का दर्द बन जाता था अगर बच्चे ने आकर किसी के बारे में कुछ पुछ लिया तो बदले में डाट-फटकार ही सुन ने को मिलती थी !

जब बड़ी हुई और थोडा पढने लगी तो तब मुझे पता चला की आखिर में नया साल कहते किसे है ! आखबार में एक दिन मैंने पढ़ा की नया साल आने पर हम अपने लिए कुछ नया करने की सोचते है और कुछ नया सिखने के लिए अपनी लाइफ को ऐसे ही जीते थे ! तब से लेकर आज तक मेरे लिए नये साल का यही अर्थ हो गया मैं हर बार कुछ करने की सोचती थी और उसी पर अटल रहने की पूरी कोसिस भी करती कभी सफल भी होती तो कभी नही भी ! जितनी बार अ-सफल होती उतनी बार मेरा विस्वास डबल हो जाता ! आज तक यही सिल-सिला चला आ रहा है और हाँ यहाँ एक और बात जब भी मैंने अपने से चीटिंग करने की सोचती या करती तो मैं अपने को ही सजा भी देती थी ! यही प्रकिर्या अभी भी चलती है !

इस बार नये साल के पहले दिन में साईं बाबा के चरणों में सर झुका के परथ्ना की है और जो भी करने के लिए सोचा है उसे पूरा करने के लिए बाबा से आशीर्वाद माँगा है ! मैं अपनी तरफ से पूरी कोसिस करुँगी की इस बार १००% नही तो उस से निचे ही सही लेकिन पूरा ही करूं !





ऑफिस में नया साल मानने का तो बस एक ही तरीका है खायो पियो और सबको नये साल की बधाई देते रहो ! चलो अच्छा है भाई ! इस बहाने पिंजरे के सारे पंछी एक साथ तो रहते है !