Wednesday, October 28, 2009

क्या खेल रचाया है किस्मत ने

ज़माने की रहेगुजर ने बहुत सताया है हमे
अपना बुला कर भी परायो का मेडल दिलवाया है हमे !!

नही है इस दिल की कोई भी शिकायत तुमसे
मेरी किस्मत ने भी ये क्या खेल रचाया है !!

यादो ने भी किनारा कर लिया है अब तो हमसे
जब से तेरे नाम को भुलाने का फरमान आया है !!

क्या भुला पाएँगे हम जिन्दगी के वो बीते हुए पल ?.
आज भी यही सवाल बार-बार इस दिल ने दोहराया है !!

सोचा न था जिन्दगी के किसी मोड़ पर यू मुलाकात होगी
और तेरी बर्बादी के इस आलम में हमारी इतनी बड़ी सोगात होगी !!

समझाने के लिए कुछ भी नही रहा मेरे पास अब इस दिल को
रोता है जब भी मेरा ये दिल तेरे संग बीते पलो को याद करके !!

यादो का बवंडर हिला जाता है मुझे जब भी जाती हूँ उस दरबार में
लेकर दुआ की पोटली सबके लिए और तेरे नाम के आंसू इन आँखों में लिए !!

सोचती हूँ जाना ही छोड़ दू अब जहाँ भी तेरी यादो का बसेरा है
लेकिन क्या करूं इस दिल का अब तो तेरी यादो का ही सहारा है !!

जाना चाहती हूँ मैं इन रिश्तो के बन्धनों से बहुत दूर
जहाँ न मिले मुझे कोई अपना बनाने और बुलाने के लिए !!

( दिल की चुभन होती है जब सीने में, आंसूं नही होते है आँखों में लेकिन इस दिल की हालत लहूँ-लुहान होती है और लबो पर झूटी मुस्कान होती है) आज मैंने एक सच्ची प्रेम कहानी पढ़ी उसको पढने के बाद मैं अपनी आँखों के आंसू रोक नही पाई.........सही कहा है किसी ने प्यार किसी को banata है तो किसी को mita dalta है...

Monday, October 19, 2009

तीन साल के बाद मनी दिवाली

ये ऑफिस भी क्या आफत बनाई है...... कुछ भी करो, कही पर भी रहो लोट कर आना वही पड़ता है किसी भी हालत में.......दिवाली का सारा नसा उत्तर जाता है जब थके हरे हमे सुबह ही ऑफिस के लिए भागना पड़ता है वो भी इन लबो पर चार इंच की मुस्कान लिए हुए..............

क्या राम जी के टाइम में भी इसी तरह से दिवाली मानते होंगे..???

जब दिवाली से पहले की तेयारी होती है तो उनहे करने में बडा मज़ा आता है, सब के लिए कुछ-न-कुछ खरीदना, घर में कुछ नया करना और अपने बडो के लिए तोफे लेना और भी बहुत कुछ........ दिल्ली में आने के बाद मैं दिवाली चाह कर भी नही मना पाई, पूरा दिन घर में ही अकेले रहती थी, मेरे लिए तो ये फेस्टिवल न होकर छुट्टी का दिन बन जाता था. बचप्पन से ही दिवाली का मुझे बहुत क्रेज़ रहा है पुरे साल में बस यही फेस्टिवल होता था जब मैं पूरा इंजॉय करती थी ! मेरे लिए तो दिवाली साल की शुरुआत होती थी हर काम में सबसे आगे होती थी चाहे वो घर की सफाई हो , खाना बनाना हो, या घर के मेन दरवाजे पर सुंदर सी रंगोली बनानी हो, पूरा इंजॉय होता मेरा परिवार के साथ.........
रिश्तो को समंझ पाना बहुत मुस्किल होता है ये मैंने बहुत बार महसूस किया है ! एक इन्सान को उसकी अपने जिन्दगी में जितना दुःख मिलता है वो उसका अपनों का ही दर्द होता है.... अगर वो दर्द देते है तो उस से निकालते भी वही रिश्ते है, बहुत ही अजीब होती है ना ये रिश्तो की डोर...........

इस बार की दिवाली मेरी ठीक रही जायदा तो नही रही लेकिन अपनों के साथ में कुछ टाइम बिता कर दिल को बहुत सुकून मिला.....बहुत अच्छा इस लिए नही क्यों की मैं पूरी तरह से इंजॉय नही कर पाई इस बेरहम शारीर ने साथ ही नही दिया, जालिम बुखार बीच में ही टपक पड़ा ये भी नही सोचा की कभी तो गलती से गलती कर ले ! टाइम से पहेले ही एंट्री करा देता है ये मुयाँ.............


Wednesday, October 14, 2009

Kuch Tu Hua Haiiiiiiiiii Do-Char Din Se Lagta Hai Aise.........(My Faviorate song)

दिल ने आज की है चाहत तेरे ही दीदार की
हमने भी दी है उसे इजाजत कुछ कर गुजर जाने !

Badla है आज maosam भी mere gher ke samne
dhunti है ye najre khi se aa jauo chupe se tum mere samne !!

Lamho की khawhish भी है आज कुछ badli- badli
दिल me ehsaas भी है आज कुछ shehme-shehme se !!!

Monday, October 12, 2009

बिखरा सा नजर आता है !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

बिखरना तो जैसे हमारी जिन्दगी का एक हिस्सा बन गया है, घर से लेकर ऑफिस तक सब भीखरा हुआ नजर आता है अपने आप को भी हम पूरी तरह से नही समंझ पाते है सब कुछ अलग-अलग सा नजर आता है...... आज शुबह ऑफिस आते ही पता चला की मेरी ट्रान्सफर कर दी गयी है दुसरे डिपार्टमेन्ट में ... हमने तो खुशी से स्वीकार कर लिया सोचा की इस में भी शायद हमारी भलाई छुपी हो बस माता रानी का आशीर्वाद बना रहे हमारे उपर..........घर में होते है तो वहां  भी कुछ साफ नजर नही आ रहा होता है सब कोई अपनी -अपनी रामधुन में लगे होते है और ऐसे लगता है जैसे की जिन्दगी सुपर फास्ट ट्रेन से भी तेज दौड़ रही है जिसका स्टाप तो है लेकिन उसके पास रुकने के लिए टाइम नही है.........

आज तक मैं बिखरने का मतलब नही समंझ पाई हूँ बचपन से लेकर अब तक सुब कुछ बिखरा ही मिला, रिश्तो को अभी तक नही समझ पाई उनको कितना ही इएकठा करने की कोशिश करो वो फिर से आस्ट दिशायो की तरह फैल जाते है.........ये भिखरना मुझे बहुत परेशान कर जाता है और कभी-कभी अच्छा भी लग जाता है अगर वो मुझे समंझ आ जाये ...........

Monday, October 05, 2009

वो यादे.........कही खो ना जाये हम

जिन्दगी में क्या- क्या नही करना पड़ता है हमे कभी हम हंसते है कभी रोते है तो कभी हम सब कुछ भुला कर इस दुनिया के पार देखना चाहते है उन्ही पुरानी जगहों पर जाना चाहते है जहाँ हमे एश्सास हुआ था की दुनिया कितनी खुबसूरत है..........वो बचपन के दिन जब मैं खुली तेज हवा के साथ उड़ती थी शाम के होते ही घर की छत पर चली जाती थी बादलो से बाते करने की उनको हवा के साथ कैसा लग रहा है पंछी मेरे साथ गुन-गुनगुनाते थे लगता था पूरा आसमा मेरे साथ झूम रहा हो..............


कहते है बीते दिन कभी लोट कर नही आते है लेकिन जब भी दिल्ली में बारिश होती है और तेज हवाएं अपना हुस्न बिखेरती है साथ में बदल झूम- झूम कर अपनी खुशी का इजहार करते रहते है तो आज भी कभी- कभी वो ही एश्सास महसूस करती हूँ वो ही गाना गुन-गुना ना चाहती हूँ !!!!!!!!!!!