जिन्दगी में क्या- क्या नही करना पड़ता है हमे कभी हम हंसते है कभी रोते है तो कभी हम सब कुछ भुला कर इस दुनिया के पार देखना चाहते है उन्ही पुरानी जगहों पर जाना चाहते है जहाँ हमे एश्सास हुआ था की दुनिया कितनी खुबसूरत है..........वो बचपन के दिन जब मैं खुली तेज हवा के साथ उड़ती थी शाम के होते ही घर की छत पर चली जाती थी बादलो से बाते करने की उनको हवा के साथ कैसा लग रहा है पंछी मेरे साथ गुन-गुनगुनाते थे लगता था पूरा आसमा मेरे साथ झूम रहा हो..............
कहते है बीते दिन कभी लोट कर नही आते है लेकिन जब भी दिल्ली में बारिश होती है और तेज हवाएं अपना हुस्न बिखेरती है साथ में बदल झूम- झूम कर अपनी खुशी का इजहार करते रहते है तो आज भी कभी- कभी वो ही एश्सास महसूस करती हूँ वो ही गाना गुन-गुना ना चाहती हूँ !!!!!!!!!!!
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