कभी मन करता
बदलो की उँचइयो तक उडु
घनघोर बरसात में भार्मन कर
भीगे बदन से टपकते पानी से
घर को पूरा भिगो दूँ
कभी बंदरो की तरह उचल
पेड़ो पर कूदते फानते
उदा कर सब ले जायुं
फिर अचनाक लगता !!!
आराम से बिस्तर पर पड़े
मनपसंद वयांजनो को स्वाद लूँ
चाय की चुस्कियां लेते
मधुर संगीत का आनान्द लूँ
आरामदेहे कमरे में विश्राम करने
शांति के वातावरण में रहूँ
फिर यौं लगता !!!
जोर जोर से चिलाकर
शांति को भंग कर दूँ
प्रेमी सव्जनो के मध्य
वार्तालाप का लुत्फ उठायुं
स्मनीयी स्थलों की सैर को निकलूं
देशाटन का आनंद लूँ
आत्मगायण में वर्धि कर लूँ
मन फिर करता !!!
एकांत मनन कर सोचु
पुस्तकालयो में जाकर
सारा गायन झान गहेन कर लूँ
झानाजार्ण कर लेने दे बाद
अपने झान को ओरो में बाटूँ
जीवन- दर्शन को समंझ
लोगो में लालक जगायं
झान-धयान और विद्या की
और तभी आनायास ही लगता !!!
यह तू मात्र छलावा
यहाँ कौन किसका और कैसा
पल भर का मात्र दिखावा
जीवन ही रैन- बसेरा
फिर क्या संध्या क्या सवेरा
यह जग यौं ही चलता
और वक्त कभी नही ठेहेरता
फिर क्या अपना क्या पराया
मैं भी बस वक्त गुजारूं
मन फिर भटकने लगता !!!
जीना क्या होगा बार-बार ?
नही ! फिर क्यों न जीउँ भरपूर
कर जायुं नाम जगत में
भूले से ही सही
कोई तो याद करेगा
कुछ धन सम्पति बचायुं
कुछ किताबे ही लिख डालूं
झान तो बाटना ही होगा
पारिवारिक जनों के परती भी
धानार्जन तो पूरी हो जाएगी
कोई कुछ भी समझे
मैं तो आपना फर्ज निभा लूँ
मन ये भी कहता !!!
ये सब भी कर लूँ
तो क्या हांसिल ?
नाम तो बदनामो का भी है
याद ही करे कोई तो कैसे भी
मैं तो उस वक्त नही हुंगी
धन होकर भी यदि मैंने
ऐश्वर्ये यापन न किया तो क्या
बंदर का अदरक सा रखूंगी
सुंदर स्वछ चमकीले वस्त्र
जो हो सबसे अलग पहनू
सब लोग मुझे देखे सराहे
केशो को ऐसे सवारूँ
मन फिर करता !!!
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