Wednesday, November 18, 2009

अनजाने रिश्ते

 कभी-कभी हम अनजाने में किसी के लिए कितना कुछ कर जाते है सोच भी नही सकते की ये हमने ही किया है ! और वो भी किसी ऐसे अनजान इन्सान की लिए जिसके साथ में हमारा दूर-दूर तक कोई रिश्ता नही होता फिर भी हम अपनों से भी बढ़ कर करते है, आज की भाग दोड भरी जिन्दगी में हम ऐसे किनते ही लोगो से मिलते है बात करते उनके दुःख सुख बाटते है साथ हँसते है रोते है! लेकिन उनमे से कितने हमारे साथ आगे चल पाते है ?.........

मैं ये तो नही कहूंगी की कभी किसी अनजान रिश्ते से नही जुड़ना चाहिए ! चाहे वो दोस्त के रूप में हो भाई के हो या बहन के रूप में मिले ! लेकिन ये सवाल आज मेरे सामने एक बहुत बड़ा पहाड़ बनकर खड़ा है जो हमेशा मुझे ऐसे ही एक रिश्ते की याद दिलाता रहता है जिसे मैंने दोस्त के रूप में पाया ! बीते दिनों के बारे में सोचती हूँ तो अपने आप से नफरत होने लगती है की मैंने ऐसे इंसान से दोस्ती क्यों की जिसे दोस्ती का अर्थ तक मालूम नही था ! अपनी जिन्दगी का बेशकीमती टाइम मैंने उसे दिया ! हर प्रकार से उसकी मदद करती थी ! इतना तो मैंने कभी अपने कैरिएर पर धयान नही लगाया जितना मैं उसके लिए इधर से उधर भागती थी ! बस उस वक्त यही लगता था की एक अच्छे इन्सान की मदद करना मेरा फर्ज है जो मुझे करनी चाहिए और कुछ नही चाहती थी मैं बस यही सोचती थी की अगर मैं अपने दोस्त के लिए कुछ कर सकती हूँ तो मुझे करना चाहिए कुछ भी सोचे समझे! शाएद ही कभी इतना मैंने कभी अपने परिवार वालो की लिए सोचा हो ! आज यही बात मुझे दुःख देती है की मैंने अपनों से बढकर जिसकी मदद की उसने मेरे विश्वास को रोंद दिया ! पैसो की भी कभी कमी नही आने दी जब देती थी तो लगता था की आज मेरे पास है तो मुझे उस की मदद करनी चाहिए शाएद भगवन की यही मर्जी है जो मुझे दोस्त बनाकर वो अपने भक्तो की मदद करना चाहता है ! हर एक कदम मैं भगवन को याद करके ही आगे बढाती थी फिर आज मुझे क्यों पछतावा हो रहा है अपनी करनी पर ! क्यों नही भुला पा रही मैं वो सब जो मैंने उस इन्सान के लिए किया...?

आज मुझे लगता है की अगर मैंने इतना कुछ उस दोस्त रूपी इन्सान के लिए किया तो इसमें में भी उपर वाले की ही कोई मर्जी रही होगी ! शायद पिछले जन्म का कोई कर्ज चुकाना था मुझे जो मैंने चुका दिया ! अब बाद में क्या पछतावा करना की मेरा अपना बनकर किसी ने मुझ से क्या लिया और क्या दिया.........

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