पुरानी डायरी के पन्नो पर लिखे हुए मेरे ये शब्द आज भी मुझे वही एश्सास दिलाते है जब मैंने पहली बार माँ से उसके बारे में सुना था ! उस दिन माँ कुछ काम करने में व्यस्त थी और मैं माँ के पास ही बैठी हुई kitaab के पेज उलट-पलट रही थी ! मेरा पढने में मन नही लग रहा था मैं बार-बार मेरे नानाजी बहुत ही अच्छे इंसान थे ! बस मैंने माँ को उनके बचपन के बारे में पूछना शुरू किया जिस में नानाजी की बहुत सी यादे जुडी हुई थी ! ये घटना मुझे आज भी वैसे ही याद है, जैसे मैंने पहली बार इसे माँ से सुना था, रिश्तो के बंधन की दांस्ता जो हमे एक नारी के बलिदान, त्याग और सहनशीलता का उदहारण देती है' मैंने जो किया है क्या वो सब लोगो के सामने बस एक दिखावा भर रह जायेगा ' नही बेटी ! " अम्मा कही दूर देखती हुई बोले जा रही थी " अभी तो मुझे अपना कर्तव्य और निभाना है ! "अम्मा बोले जा रही थी मुझे उनकी आँखों में मुझे वो चमक नज़र आ रही थी जो एक २०-२२ साल की लड़की आँखों में होती है ! जब वह अपने ससुराल जाती है" मैंने उनका हाथ पकड़ते हुए बोला ! अम्मा ! अब बस भी करो अंदर जाकर आराम करो ! आप की तबियत भी ठीक नही है , कोई नही आएगा तुम्हे लेने के लिए " मैंने उठते हुए बोला इन बीस सालो में किसी ने भी आप की तरफ मुडकर भी नही देखा है और आप............... " अम्मा बीच में ही मेरी बात को अनसुना करते हुए बोलती है ! नही बेटी !!!!!!! " अम्मा मुस्कुराते हुए मुझे देखते हुए कहती है " मुझे इसकी कोई परवाह नही है वो इतने सालो से नही आये तो क्या मैं अपना फ़र्ज़ भूल जायुं ! " अम्मा उदास होते हुए बोलती है " मैं अपनी अंतिम सांसे भी उन्ही के नाम कर देना चाहती हूँ आज उनको मेरी जरुरत है !!!
" अम्मा बोले जा रही थी "
बेटी तुम क्या जानो रिश्तो की गहरायिओं को मैंने रिश्तो को बहुत करीब से बनते और बिगड़ते देखा है ! संजीव ( amma ka pati ) अब मौत के मुह के कगार पर खड़ा हुआ था ! उसने सरस्वती के पास सन्देश भेजा की वह उसको लेने के लिए अपने बेटो को भेज रहा है ! संजीव की दूसरी पत्नी तारा जिसके तीन बेटे हुए थे और उसके बाद वह उसका साथ छोडकर स्वर्ग सिधार गयी ! जिसकी खातिर संजीव ने सरस्वती को घर से निकाला था आज अंतिम झानो में वो भी उसका साथ न दे पाई !!!!!!!
हम चार बहने थी मैं घर में सबसे बड़ी थी दूसरी बहन अनीता और उस से छोटी मंजू और सबसे छोटी प्रीती जब दस साल की थी तो माँ गुजर गयी ! बाबूजी के उपर सारी जिमेवारी आ गयी थी ! बाबूजी सुबहा होते ही खेत पर काम करने चले जाते ! और मैं तीनो बहनों को तेयार कर स्कूल भेज देती ! मैं सारा दिन घर पर रहकर चुल्हा चोका करती थी ! मैं जादा नही पढ़ पाई माँ के जाने के बाद पूरा काम मैंने सभाल लिया था बस पढना जानती थी लिखना ठीक से नही आता था ! उस टाइम में लडकियों को पढ़ाना एक पाप की तरह मना जाता था माँ के टाइम में बाबूजी ने कभी मुझे घर से बहार नही निकलने देते थे ! मैं बाबूजी की सबसे जादा लाडली थी लेकिन फिर भी मैंने थोडा पढना-लिखना सिख लिया था !!!! जब अनीता घर का चूल्हा चोका करने लगी तो बाबूजी ने मुझे मामाजी के पास भेज दिया और उनसे कहा की " अब बेटियां जवान हो गयी है इनकी शादी की जिमेवारी आप पर ही है मैं तो गंवार आदमी हूँ ! मैं क्या जानू शादी-बय्ह रचाना, मैं तो बस खेतो में कमा कर दे सकती हूँ
मेरे मामाजी भी हम चारो बहनों को बहुत प्यार करते थे ! धीरे-धीरे मामाजी ने हम चारो को अपने पास बुला लिया ! उनको कोई संतान न थी उनकी दो बीवियां थी दूसरी बीवी उनके भाई की विधवा थी जिसको उन्हें अपने साथ ही रखना पड़ा ये सब उनकी पत्नी को अच्छा नही लगा और व्ह अपने मायेके में जाकर रहने लगी! दूसरी पत्नी को कोई बच्चा नही था तो मामाजी हम चारो बहनों को अपने साथ रखने लगे !
हम लोग वहां बहुत खुश थे मामाजी हमे खेत पर अपने साथ लेकर जाते और साथ ही लेट थे !
जब मैं सोलह साल की थी तो मामाजी ने मेरी शादी कर दी ! और उसके एक-एक साल बाद मेरी तीनो बहनों के हाथ पीले कर दिए ! हम चारो बहनों की शादी अच्छे परिवारों में हुई थी !
मैं अपने ससुराल में इकलोती बहु थी ! सास शादी से पहले ही गुजर चुकी थी ! घर में नोकर- चाकर बहुत थे लेकिन फिर भी मैं सारा दिन घर के कामो में लगी रहती थी !!
शादी को एक साल भी नही गुजरा था की मेरे पेरो तलो की जमीन खिसक गयी!
एक दिन शाम को मैं रोज की तरह भेसो को चारा डालकर घर को आई थी ! मैं अंदर जाकर अपने कमरे में लेती ही थी की ! अचानक से बहार की और से मुझे तेज-तेज आवाजे सुनई पड़ी मैं जल्दी से उठकर बहार की तरफ आई ! तो देखा की ससुर जी अपने हाथो में उनके खून से भीगे हुए कपडे लिए हुए दरवाजे पर थे ! मैं पर्दे के पीछे से ये सब देख रही थी वः अंदर आकर जमीन पर बैठ गये ! वः ऐसे दिख रहे थे की जैसे उनकी सांसो ने ही उनका साथ छोड़ दिया हो ! उनके पीछे गावं के कुछ और भी आदमी थे जो उनको घेरे हुए थे ! सभी आपस में खुसुर - मुसुर कर रहे थे किसी आवाज़ साफ सुनाई नही पढ़ रही थी ! तभी मैंने थोडा आगे बढकर देखा तो ससुर जी अपने दोनों हाथ उपर उठाये चीख-चीख कर जैसे सारे आसमान को अपने पास बुलाना चाहते हो ! वः रोते-रोते नीचे जमीन पर गिर गये वः फुट-फुट कर रो रहे थे ! सभी की आँखों में आंसू थे मुझे अब सबकुछ समंझ आ गया था मेरी होठो की हंसी पानी की तरह बह चुकी थी ! मैं जहाँ खाड़ी थी वही निचे की और बैठ गयी ! समंझ में नही आ रहा था की ये सब क्या हो रहा है ! अभी थोड़ी देर पहले तक मैं बहुत खुश थी और अभी जैसे मेरे शारीर से आत्मा को निकाल लिया गया हो ! पड़ोस की ओरते मुझे घेरे हुए बैठी थी ! मेरी आँखों से आंसू बहे जा रहे थे ! मैं एक लगाये हुए अपने कमरे की तरफ देखे जा रही थी ! तभी किसी ने आकर मेरे हाथो की चुदियाँ मोलाई जा रही थी मैं बेसुध की तरह ' जिसमे अब कुछ भी नही बचा हो ' ऐसे ही बैठी रही ! और फिर कमला ने पकड़ कर mujh झकझोरा " सरस्वती हम आनाथ हो गये है मेरा भाई तुम्हे छोडकर जा चुका है तुम बिधवा हो चुकी हो "
मैंने कमला की तरफ देखा और उसके गले से लगकर चीख-चीखकर रोने लगी ! कमला भी बुरी तरह से रोये जा रही थी उसका एकलोता भाई जो जा चुका था ! सब कुछ ख़त्म हो चुका था !
समय कुछ बीता कमला भी अपने ससुराल चली गयी वो ही तो इकलोती बची थी इस परिवार की !
(आगे पढने के लिए अभी थोडा इंतजार करना होगा)
6 comments:
बहुत खूब
dairy hamesha ek poora jiya gayaa jeevan hoti he..yadi vo likhi jaati rahe to samajhiye ham apna itihaas likh rahe he, ek jeevan ko utaar rahe he..asal me vahi ekmatra vaaris he.
bahut achha likha he aapne.
बेहतरीन लिखा है आपने.
जारी रहें. शुभकामनाएं.
[उल्टा तीर]
पारिवारिक पृष्ठभूमि से जुड़े संस्मरण ही व्यक्ति के जीवन की दशा दिशा तय करते हैं.
(श्रिंखला वाली पोस्ट के लिए इंतज़ार करना मुश्किल होता है. )
इंतजार है आगे का ~~~~
खुबसूरत पेशकश, ऐसे ही कलम तोडे रहिये।
सुनील पाण्डेय
नई दिल्ली।
09953090154
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