Thursday, February 25, 2010

जाने क्यों तुम इतना याद आते हो !


देखती हुँ मैं जब-जब तेरी सुरत दिल को मेरे करार आता है
तु दुर ही सही मुझ से ! मेरे इस दिल के करीब तो रहता है

न तुझ से कह पाए ना खुद ही जान पाए अपने दिल की हालत
मेरे इस कम्बख्त दिल को भी अभी तेरा दुर जाना याद आया

दूर रह के भी हक़ जताते हो मुझ पर तुमने क्या रोब जमाया है
कभी तो सुनाया करो अपनी आवाज भी जिस से हमे करार आता है

सुबह जगते ही तेरा ख्याल आता है जाने क्यों तुम इतना याद आते हो
आँखे मलते जाते है अपने आगंन में फिर भी तुम नजरो से दूर होते हो

यादे बड़ी जालिम होती है डूबा देती है हमे तेरे आतीत के आईने में
समझाते है फिर अकेले में बैठ कर दिल को जब भी बहुत याद आता है

4 comments:

neelima garg said...

cute poem.....

दिगम्बर नासवा said...

सुबह जगते ही तेरा ख्याल आता है जाने क्यों तुम इतना याद आते हो
आँखे मलते जाते है अपने आगंन में फिर भी तुम नजरो से दूर होते हो ..

ये तो हसीन लोगो की अदा है ... बहुत अच्छा लिखा है ....

Udan Tashtari said...

बढ़िया भाव...नियमित लिखें.

सुशील छौक्कर said...

अहसासों को बहुत खूब उकेरा है।