Thursday, January 21, 2010

फिर भी क्यों लगता है ऐसे की कुछ था मेरे सामने

उस गहरी काली रात की घटा अभी तलक तक उतरी नही
सोचती रही मैं जब तलक ये सांस मेरी चलती रही

देखना चाहती थी मैं बादलो के उस पार का वो राज
जिसके लिए मेरी ये आँखे बरसो से तरसती रही

छा गया गहन अँधियारा मेरे अपने उस जहाँन में
फिर भी क्यों लगता है ऐसे की कुछ था मेरे सामने

किनारा नही मिलता है किसी को उस सागर की ग्हेरायी में
सोच कर रह जाती हूँ मैं बस अपनी ही तान्हाहियो में

कहने के लिए कुछ शब्द ही नही थे मेरे महेकाने में
पगली बनी देखती रही मैं और कहीं दूर डूबता रहा मेरा आशियाना !!!!!!!!!!!!!

3 comments:

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

स्वप्नदृष्टा की रचना. सुंदर.

Unknown said...

kya baat h
bahut sundar

अनिल कान्त said...

भाव और शब्द संयोजन बहुत अच्छा है इस रचना का .