उस गहरी काली रात की घटा अभी तलक तक उतरी नही
सोचती रही मैं जब तलक ये सांस मेरी चलती रही
देखना चाहती थी मैं बादलो के उस पार का वो राज
जिसके लिए मेरी ये आँखे बरसो से तरसती रही
छा गया गहन अँधियारा मेरे अपने उस जहाँन में
फिर भी क्यों लगता है ऐसे की कुछ था मेरे सामने
किनारा नही मिलता है किसी को उस सागर की ग्हेरायी में
सोच कर रह जाती हूँ मैं बस अपनी ही तान्हाहियो में
कहने के लिए कुछ शब्द ही नही थे मेरे महेकाने में
पगली बनी देखती रही मैं और कहीं दूर डूबता रहा मेरा आशियाना !!!!!!!!!!!!!
3 comments:
स्वप्नदृष्टा की रचना. सुंदर.
kya baat h
bahut sundar
भाव और शब्द संयोजन बहुत अच्छा है इस रचना का .
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