Tuesday, November 03, 2009

वो भीगे हुए चाँद की रोशानी

आज चमकते हुए चाँद को देखने की आस है
तेरे संग में तारो के साथ मिल कर खेलने की प्यास है !!

जमी पर चाँद ने आज बिखेरा है अपना शर्मीला हुस्न
क्या? आज तेरे आने की भी कोई आस है मेरे आगन में !!

तारो ने मनाई है आज ख़ुशी चलो कही तो प्यास है
मेरी न सही किसी की तो आज बुझी बरसो की प्यास है !!

सुनहरे रेती पर चमकते हुए चाँद की वो प्यारी रौशनी
आज भी याद है मुझे बचपन की हंसी जब देखी वो चांदनी !!

भूले से भी नही भुला सकती वो चमकते हुए रेत की खुशी
मैं भी खुश होती थी उसके साथ में दिल में न थी कोई आस भी !!

जाते हुए लम्हों को करना चाहती हूँ शामिल अपनी यादो में
बर्षो के बाद जगी है आज तमन्ना क्या फिर से भी जा पाऊँगी !!

जो जिए थे मैंने अनजाने से एहसास खुबसूरत चाँद के साथ में
क्या फिर से जा पाऊँगी मैं उस चमकते हुए देश में ??????????

3 comments:

mark rai said...

very nice......

सुशील छौक्कर said...

"खारी" सरनेम देखकर आपके ब्लोग पर आया। गुर्जरों में लिक्खड कहाँ मिलते है। आ गए देखने कि आप ब्लोग पर क्या क्या लिखती है। यहाँ आकर देखा तो कम पोस्ट। एक दो रचनाएं। अच्छा लिखा है आपने इन रचना में। सबसे पहली पोस्ट में कमाल की बात लिखी है "भगवान"पर। आप रोमन की बजाय हिंदी में लिखा करें। आपकी लेखनी खूब लिखे,खूब चमके उसके लिए ढेर सारी शुभकामनाएं।

Savita Rana said...

Bahut-bahut shukria sushil ji blog per aane ke liye, aage se hindi me hi likha karungi, aaj-kal thodi buzy hun, shadi kerne ja rhi hun.......