Tuesday, May 04, 2010

एक मुसाफिर के सफर सी है सबकी दुनिया

अब खुशी हैं न कोई दर्द रुलाने वाला,
हमने अपना लिया हर रंग जमाने वाला !

हर बेचेहरा सी उम्मीद है चेहरा -चेहरा
जिस तरफ देखिये आने को है आने वाला !

उसको रुखसत तो किया मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला !


घर के चाँद को देखो किसी आँचल में
ये उजाला नही आँगन में समाने वाला !

एक मुसाफिर के सफर सी है सबकी दुनिया
कोई जल्दी में तो कोई देर से जाने वाला !

2 comments:

मीत said...

बहुत कम शब्दों में बेहद सराहनीय रचना...
लिखते रहिये...

मीत said...

बहुत कम शब्दों में बेहद सराहनीय रचना...
लिखते रहिये...