अब खुशी हैं न कोई दर्द रुलाने वाला,
हमने अपना लिया हर रंग जमाने वाला !
हर बेचेहरा सी उम्मीद है चेहरा -चेहरा
जिस तरफ देखिये आने को है आने वाला !
उसको रुखसत तो किया मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला !
घर के चाँद को देखो किसी आँचल में
ये उजाला नही आँगन में समाने वाला !
एक मुसाफिर के सफर सी है सबकी दुनिया
कोई जल्दी में तो कोई देर से जाने वाला !
2 comments:
बहुत कम शब्दों में बेहद सराहनीय रचना...
लिखते रहिये...
बहुत कम शब्दों में बेहद सराहनीय रचना...
लिखते रहिये...
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